Tuesday, 29 March 2016

राजस्थान दिवस (30 मार्च) पर इसके एकीकरण पर संक्षिप्त किन्तु विशेष जानकारी  
राजस्थान भारत का एक महत्वपूर्ण प्रांत है। यह 30 मार्च 1949 को भारत का एक ऐसा प्रांत बना, जिसमें तत्कालीन राजपूताना की शक्तिशाली रियासतें विलीन हुईं। भरतपुर के जाट शासक ने भी अपनी रियासत का  विलय राजस्थान में किया था। राजस्थान शब्द का अर्थ है: 'राजाओं का स्थान' क्योंकि यहां गुर्जर, राजपूत, मौर्य, जाट आदि ने पहले राज किया था। भारत के संवैधानिक-इतिहास में राजस्थान का निर्माण एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत को आजाद करने की घोषणा करने के बाद जब सत्ता-हस्तांतरण की कार्यवाही शुरू की, तभी लग गया था कि आजाद भारत का राजस्थान प्रांत बनना और राजपूताना के तत्कालीन हिस्से का भारत में विलय एक दूभर कार्य साबित हो सकता है। आजादी की घोषणा के साथ ही राजपूताना के देशी रियासतों के मुखियाओं में स्वतंत्र राज्य में भी अपनी सत्ता बरकरार रखने की होड़ सी मच गयी थी, उस समय वर्तमान राजस्थान की भौगालिक स्थिति के नजरिये से देखें तो राजपूताना के इस भूभाग में कुल बाईस देशी रियासतें थी। इनमें एक रियासत अजमेर मेरवाडा प्रांत को छोड़ कर शेष देशी रियासतों पर देशी राजा महाराजाओं का ही राज था। अजमेर-मेरवाडा प्रांत पर ब्रिटिश शासकों का कब्जा था; इस कारण यह तो सीघे ही स्वतंत्र भारत में आ जाती, मगर शेष इक्कीस रियासतों का विलय होना यानि एकीकरण कर 'राजस्थान' नामक प्रांत बनाया जाना था। सत्ता की होड़ के चलते यह बडा ही दूभर लग रहा था क्योंकि इन देशी रियासतों के शासक अपनी रियासतों के स्वतंत्र भारत में विलय को दूसरी प्राथमिकता के रूप में देख रहे थे। उनकी मांग थी कि वे सालों से खुद अपने राज्यों का शासन चलाते आ रहे हैं, उन्हें इसका दीर्घकालीन अनुभव है, इस कारण उनकी रियासत को 'स्वतंत्र राज्य' का दर्जा दे दिया जाए। करीब एक दशक की ऊहापोह के बीच 18 मार्च 1948 को शुरू हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया कुल सात चरणों में एक नवंबर 1956 को पूरी हुई। इसमें भारत सरकार के तत्कालीन देशी रियासत और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी. पी. मेनन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इनकी सूझबूझ से ही राजस्थान के वर्तमान स्वरुप का निर्माण हो सका।

पहला चरण- 18 मार्च 1948
सबसे पहले अलवर, भरतपुर, धौलपुर, व करौली नामक देशी रियासतों का विलय कर तत्कालीन भारत सरकार ने फरवरी 1948 मे अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर 'मत्स्य यूनियन' के नाम से पहला संघ बनाया। यह राजस्थान के निर्माण की दिशा में पहला कदम था। इनमें अलवर व भरतपुर पर आरोप था कि उनके शासक राष्टृविरोधी गतिविधियों में लिप्त थे। इस कारण सबसे पहले उनके राज करने के अधिकार छीन लिए गए व उनकी रियासत का कामकाज देखने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। इसी की वजह से राजस्थान के एकीकरण की दिशा में पहला संघ बन पाया। यदि प्रशासक न होते और राजकाज का काम पहले की तरह राजा ही देखते तो इनका विलय असंभव था क्योंकि इन राज्यों के राजा विलय का विरोध कर रहे थे। 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ का उद़घाटन हुआ और धौलपुर के तत्कालीन महाराजा उदयसिंह को इसका राजप्रमुख मनाया गया। इसकी राजधानी अलवर रखी गयी थी। मत्स्य संघ नामक इस नए राज्य का क्षेत्रफल करीब तीस हजार किलोमीटर था, जनसंख्या लगभग 19 लाख और सालाना-आय एक करोड 83 लाख रूपए थी। जब मत्स्य संघ बनाया गया तभी विलय-पत्र में लिख दिया गया कि बाद में इस संघ का 'राजस्थान' में विलय कर दिया जाएगा।
दूसरा चरण 25 मार्च 1948
राजस्थान के एकीकरण का दूसरा चरण पच्चीस मार्च 1948 को स्वतंत्र देशी रियासतों कोटा, बूंदी, झालावाड, टौंक, डूंगरपुर, बांसवाडा, प्रतापगढ, किशनगढ और शाहपुरा को मिलाकर बने राजस्थान संघ के बाद पूरा हुआ। राजस्थान संघ में विलय हुई रियासतों में कोटा बड़ी रियासत थी, इस कारण इसके तत्कालीन महाराजा महाराव भीमसिंह को राजप्रमुख बनाया गया। bundi के तत्कालीन महाराव बहादुर सिंह राजस्थान संघ के राजप्रमुख भीमसिंह के बडे भाई थे, इस कारण उन्हें यह बात अखरी कि छोटे भाई की 'राजप्रमुखता' में वे काम कर रहे है। इस ईर्ष्या की परिणति तीसरे चरण के रूप में सामने आयी।
तीसरा चरण 18 अप्रैल 1948
बूंदी के महाराव बहादुर सिंह नहीं चाहते थें कि उन्हें अपने छोटे भाई महाराव भीमसिंह की राजप्रमुखता में काम करना पडे, मगर बडे राज्य की वजह से भीमसिंह को राजप्रमुख बनाना तत्कालीन भारत सरकार की मजबूरी थी। जब बात नहीं बनी तो बूंदी के महाराव बहादुर सिंह ने उदयपुर रियासत को पटाया और राजस्थान संघ में विलय के लिए राजी कर लिया। इसके पीछे मंशा यह थी कि बडी रियासत होने के कारण उदयपुर के महाराणा को राजप्रमुख बनाया जाएगा और बूंदी के महाराव बहादुर सिंह अपने छोटे भाई महाराव भीम सिंह के अधीन रहने की मजबूरी से बच जाएगे और इतिहास के पन्नों में यह दर्ज होने से बच जाएगा कि छोटे भाई के राज में बडे भाई ने काम किया। अठारह अप्रेल 1948 को राजस्थान के एकीकरण के तीसरे चरण में उदयपुर रियासत का राजस्थान संघ में विलय हुआ और इसका नया नाम हुआ 'संयुक्त राजस्थान संघ' माणिक्य लाल वर्मा के नेतृत्व में बने इसके मंत्रिमंडल में उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह को राजप्रमुख बनाया गया, कोटा के महाराव भीमसिंह को वरिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया। और कुछ इस तरह बूंदी के महाराजा की चाल भी सफल हो गयी।
चौथा चरण तीस मार्च 1949
इससे पहले बने संयुक्त राजस्थान संघ के निर्माण के बाद तत्कालीन भारत सरकार ने अपना ध्यान देशी रियासतों जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर पर केन्द्रित किया और इसमें सफलता भी हाथ लगी और इन चारों रियासतो का विलय करवाकर तत्कालीन भारत सरकार ने तीस मार्च 1949 को वृहत्तर राजस्थान संघ का निर्माण किया, जिसका उदघाटन भारत सरकार के तत्कालीन रियासती और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। यही ३० मार्च आज राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है। इस कारण इस दिन को हर साल राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है। हालांकि अभी तक चार देशी रियासतो का विलय होना बाकी था, मगर इस विलय को इतना महत्व नहीं दिया जाता, क्योंकि जो रियासते बची थी वे पहले चरण में ही 'मत्स्य संघ' के नाम से स्वतंत्र भारत में विलय हो चुकी थी। अलवर, भतरपुर, धौलपुर व करौली नामक इन रियासतो पर भारत सरकार का ही आधिपत्य था इस कारण इनके राजस्थान में विलय की तो मात्र औपचारिकता ही होनी थी।
पांचवा चरण 15 अप्रैल 1949
पन्द्रह अप्रेल 1949 को मत्स्य संध का विलय ग्रेटर राजस्थान में करने की औपचारिकता भी भारत सरकार ने निभा दी। भारत सरकार ने 18 मार्च 1948 को जब मत्स्य संघ बनाया था तभी विलय पत्र में लिख दिया गया था कि बाद में इस संघ का राजस्थान में विलय कर दिया जाएगा। इस कारण भी यह चरण औपचारिकता मात्र माना गया।
छठा चरण 26 जनवरी 1950
भारत का संविधान लागू होने के दिन 26 जनवरी 1950 को सिरोही रियासत का भी विलय ग्रेटर राजस्थान में कर दिया गया। इस विलय को भी औपचारिकता माना जाता है क्योंकि यहां भी भारत सरकार का नियंत्रण पहले से ही था। दरअसल जब राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी, तब सिरोही रियासत के शासक नाबालिग थे। इस कारण सिरोही रियासत का कामकाज दोवागढ की महारानी की अध्यक्षता में एजेंसी कौंसिल ही देख रही थी जिसका गठन भारत की सत्ता हस्तांतरण के लिए किया गया था। सिरोही रियासत के एक हिस्से आबू देलवाडा को लेकर विवाद के कारण इस चरण में आबू देलवाडा तहसील को बंबई और शेष रियासत विलय राजस्थान में किया गया।
सांतवा चरण एक नवंबर 1956
अब तक अलग चल रहे आबू देलवाडा तहसील को राजस्थान के लोग खोना नही चाहते थे, क्योंकि इसी तहसील में राजस्थान का कश्मीर कहा जाने वाला आबूपर्वत भी आता था, दूसरे राजस्थानी, बच चुके सिरोही वासियों के रिश्तेदार और कईयों की तो जमीन भी दूसरे राज्य में जा चुकी थी। आंदोलन हो रहे थे, आंदोलन कारियों के जायज कारण को भारत सरकार को मानना पडा और आबू देलवाडा तहसील का भी राजस्थान में विलय कर दिया गया। इस चरण में कुछ भाग इधर उधर कर भौगोलिक और सामाजिक त्रुटि भी सुधारी गया। इसके तहत मध्यप्रदेश में शामिल हो चुके सुनेल थापा क्षेत्र को राजस्थान में मिलाया गया और झालावाड जिले के उप जिला सिरनौज को मध्यप्रदेश को दे दिया गया।
इसी के साथ राजस्थान का निर्माण या एकीकरण पूरा हुआ। जो राजस्थान के इतिहास का एक अति महती  कार्य था l


Tuesday, 27 October 2015

गोपी गीत ( श्रीमद्भागवत )


ध्यान
कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष: स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं॥
भावार्थ:- हे श्रीकृष्ण! आपके मस्तक पर कस्तूरी तिलक सुशोभित है। आपके वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि विराजित है, आपने नाक में सुंदर मोती पहना हुआ है, आपके हाथ में बांसुरी है और कलाई में आपने कंगन धारण किया हुआ है।
सर्वांगे हरि चन्दनं सुललितं कंठे च मुक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपाल चूडामणि:॥
भावार्थ:- हे हरि! आपकी सम्पूर्ण देह पर सुगन्धित चंदन लगा हुआ है और सुंदर कंठ मुक्ताहार से विभूषित है, आप सेवारत गोपियों के मुक्ति प्रदाता हैं, हे गोपाल! आप सर्व सौंदर्य पूर्ण हैं, आपकी जय हो।

गोपी गीत – गोप्य: ऊचु:
जयति तेऽधिकं जन्मना ब्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥ (१)
भावार्थ:- हे प्रियतम प्यारे! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोको से भी अधिक ब्रज की महिमा बढ गयी है, तभी तो सौन्दर्य और माधुर्य की देवी लक्ष्मी जी स्वर्ग छोड़कर यहाँ की सेवा के लिये नित्य निरन्तर यहाँ निवास करने लगी हैं। हे प्रियतम! देखो तुम्हारी गोपीयाँ जिन्होने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन-वन मे भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं। (१)
शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (२)
भावार्थ:- हे हमारे प्रेम पूरित हृदय के स्वामी! हम तुम्हारे बिना मोल की दासी हैं, तुम शरद ऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो। हे प्रिय! अस्त्रों से हत्या करना ही वध होता है, क्या इन नेत्रों से मारना हमारा वध करना नहीं है। (२)
विषजलाप्ययाद्‍ व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्‍ वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद्‍ विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥ (३)
भावार्थ:- हे पुरुष शिरोमणि! यमुना जी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु, अज़गर के रूप में खाने वाला अधासुर, इन्द्र की बर्षा, आकाशीय बिजली, आँधी रूप त्रिणावर्त, दावानल अग्नि, वृषभासुर और व्योमासुर आदि से अलग-अलग समय पर सब प्रकार भयों से तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है। (३)
न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥ (४)
भावार्थ:- हे हमारे परम-सखा! तुम केवल यशोदा के पुत्र ही नहीं हो, तुम तो समस्त शरीर धारियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से रहने वाले साक्षी हो। हे सखा! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिये तुम यदुवंश में प्रकट हुए हो। (४)
विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥ (५)
भावार्थ:- हे यदुवंश शिरोमणि! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा को पूर्ण करने में सबसे आगे रहते हो, जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हे तुम्हारे करकमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं। सबकी लालसा-अभिलाषा को पूर्ण करने वाला वही करकमल जिससे तुमने लक्ष्मी जी का हाथ पकड़ा है। हे प्रिय! वही करकमल हमारे सिर पर रख दो। (५)
व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥ (६)
भावार्थ:- हे वीर शिरोमणि श्यामसुन्दर! तुम तो सभी ब्रजवासियों के दुखों को दूर करने वाले हो, तुम्हारी मन्द-मन्द मुस्कान की एक झलक ही तुम्हारे प्रेमीजनों के सारे मान मद को चूर-चूर कर देने के लिये पर्याप्त है। हे प्यारे सखा! हम से रूठो मत, प्रेम करो, हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों में निछावर हैं, हम अबलाओं को अपना वह परम सुन्दर साँवला मुखकमल दिखलाओ। (६)
प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्॥ (७)
भावार्थ:- तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणीयों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं, लक्ष्मीजी सौन्दर्य और माधुर्य की खान हैं, वह जिन चरणों को अपनी गोद में रखकर निहारा करती हैं, वह कोमल चरण बछड़ों के पीछे-पीछे चल रहे हैं, उन्ही चरणों को तुमने कालियानाग के शीश पर धारण किया था, तुम्हारी विरह की वेदना से हृदय संतप्त हो रहा है, तुमसे मिलन की कामना हमें सता रही है। हे प्रियतम! तुम उन शीतलता प्रदान करने वाले चरणों को हमारे जलते हुए वक्ष:स्थल पर रखकर हमारे हृदय की आग्नि को शान्त कर दो। (७)
मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः॥ (८)
भावार्थ:- हे कमलनयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है, तुम्हारा एक-एक शब्द हमारे लिये अमृत से बढ़कर मधुर हैं, बड़े-बड़े विद्वान तुम्हारी वाणी से मोहित होकर अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं। उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी हम दासी मोहित हो रहीं है। हे दानवीर! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन दान दो। (८)
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥ (९)
भावार्थ:- हे हमारे स्वामी! तुम्हारी कथा अमृत स्वरूप हैं, जो विरह से पीड़ित लोगों के लिये तो वह जीवन को शीतलता प्रदान करने वाली हैं, ज्ञानीयों, महात्माओं, भक्त कवियों ने तुम्हारी लीलाओं का गुणगान किया है, जो सारे पाप-ताप को मिटाने वाली है। जिसके सुनने मात्र से परम-मंगल एवं परम-कल्याण का दान देने वाली है, तुम्हारी लीला-कथा परम-सुन्दर, परम-मधुर और कभी न समाप्त होने वाली हैं, जो तुम्हारी लीला का गान करते हैं, वह लोग वास्तव में मत्यु-लोक में सबसे बड़े दानी हैं। (९)
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि॥ (१०)
भावार्थ:- हे हमारे प्यारे! एक दिन वह था, तुम्हारी प्रेम हँसी और चितवन तथा तुम्हारी विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं का ध्यान करके हम आनन्द में मग्न हो जाया करतीं थी। हे हमारे कपटी मित्र! उन सब का ध्यान करना भी मंगलदायक है, उसके बाद तुमने एकान्त में हृदयस्पर्शी ठिठोलियाँ की और प्रेम की बातें की, अब वह सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर रही हैं। (१०)
चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥ (११)
भावार्थ:- हमारे प्यारे स्वामी! तुम्हारे चरण कमल से भी कोमल और सुन्दर हैं, जब तुम गौओं को चराने के लिये ब्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे युगल चरण कंकड़, तिनके, घास, और काँटे चुभने से कष्ट पाते होंगे तो हमारा मन बहुत वेचैन हो जाता है। (११)
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि॥ (१२)
भावार्थ:- हे हमारे वीर प्रियतम! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं, कि तुम्हारे मुखकमल पर नीली-नीली अलकें लटक रहीं है और गौओं के खुर से उड़-उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है। तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखाकर हमारे हृदय को प्रेम-पूरित करके मिलन की कामना उत्पन्न करते हो। (१२)
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्॥ (१३)

भावार्थ:- हे प्रियतम! तुम ही हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो, तुम्हारे चरणकमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली हैं, इन चरणों के ध्यान करने मात्र से सभी ब्याधायें शान्त हो जाती हैं। हे प्यारे! तुम अपने उन परम-कल्याण स्वरूप चरणकमल हमारे वक्ष:स्थल पर रखकर हमारे हृदय की व्यथा को शान्त कर दो। (१३)
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥ (१४)
भावार्थ:- हे वीर शिरोमणि! आपका अधरामृत तुम्हारे स्मरण को बढ़ाने वाला है, सभी शोक-सन्ताप को नष्ट करने वाला है, यह बाँसुरी तुम्हारे होठों से चुम्बित होकर तुम्हारा गुणगान करने लगती है। जिन्होने इस अधरामृत को एक बार भी पी लिया तो उन लोगों को अन्य किसी से आसक्तियों का स्मरण नहीं रहता है, तुम अपना वही अधरामृत हम सभी को वितरित कर दो। (१४)
अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ (१५)
भावार्थ:- हे हमारे प्यारे! दिन के समय तुम वन में विहार करने चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिये एक क्षण भी एक युग के समान हो जाता है, और तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकावली से युक्त तुम्हारे सुन्दर मुखारविन्द को हम देखती हैं, उस समय हमारी पलकों का गिरना हमारे लिये अत्यन्त कष्टकारी होता है, तब ऎसा महसूस होता है कि इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है। (१५)
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि॥ (१६)
भावार्थ:- हे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर! हम अपने पति, पुत्र, सभी भाई-बन्धु और कुल परिवार को त्यागकर उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं। हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत को समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं। हे कपटी! इसप्रकार रात्रि को आयी हुई युवतियों को तुम्हारे अलावा और कौन छोड़ सकता है। (१६)
रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः॥ (१७)
भावार्थ:- हे प्यारे! एकान्त में तुम मिलन की इच्छा और प्रेमभाव जगाने वाली बातें किया करते थे, हँसी-मजाक करके हमें छेड़ते थे, तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्करा देते थे। तुम्हारा विशाल वक्ष:स्थल, जिस पर लक्ष्मीजी नित्य निवास करती हैं। हे प्रिय! तब से अब तक निरन्तर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यधिक आसक्त होता जा रहा है। (१७)
व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्॥ (१८)
भावार्थ:- हे प्यारे! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति ब्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुख-ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिये है। हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है, कुछ ऎसी औषधि प्रदान करो जो तुम्हारे भक्तजनों के हृदय-रोग को सदा-सदा के लिये मिटा दे। (१८)
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (१९)
भावार्थ:- हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे चरण कमल से भी कोमल हैं, उन्हे हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते-डरते बहुत धीरे से रखती हैं, जिससे आपके कोमल चरणों में कहीं चोट न लग जाये, उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे हुए भटक रहे हो, क्या कंकण, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से आपके चरणों मे पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही अचेत होती जा रही हैं। हे प्यारे श्यामसुन्दर! हे हमारे प्राणनाथ! हमारा जीवन तुम्हारे लिये है, हम तुम्हारे लिये ही जी रहीं है, हम सिर्फ तुम्हारी ही हैं। (१९)


Tuesday, 6 October 2015

कालेराम मंदिर, नासिक

काला राम मंदिर,  नासिक



दक्षिण के काशी कहे जाने वाले नगर नासिक का महत्व त्रेतायुग से विद्यमान है रामायण काल में अपने वनवास प्रवास के दौरान प्रभु रामचंद्र ने सीता एवं लक्ष्मण सहित कुछ समय के लिए इस स्थान पर  प्रवास किया था। जंहा जंहा प्रभु श्रीराम  के चरण पड़े वह भूमि पवित्र हो गई। उनके पदचिह्नों के रूप में अनेक मंदिर आज भी नासिक में स्थित हैं जो हमें रामायण काल का स्मरण कराते हैं l  
यूँ तो नासिक में प्रभु श्रीराम के कई मंदिर हैं। कालाराम, गोराराम, मुठे का राम, यहाँ तक कि महिलाओं के लिए विशेषराम आदि, किन्तु  इन सभी में 'कालाराम' की अपनी अलग ही विशेषता है। यह मंदिर ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से तो महत्व रखता ही है, साथ ही इसके  वास्तु शिल्प में  ‍इस तरह का आकर्षण है जो दर्शनार्थी को मंत्रमुग्ध कर देता है। शिल्प की दृष्टि से कालाराम मंदिर एवं त्र्यम्बकेश्वर मंदिर में बहुत समानता प्रतीत होती है l
पेशवा के सरदार रंगराव ओढ़ेकर द्वारा यह मंदिर ईस्वी सन 1782 में काले पाषाणों से नागर शैली में निर्मित कराया गया था। मंदिर में विराजित प्रभु श्रीराम सहित माता सीता एवं लक्ष्मण जी की मूर्तियाँ  भी काले पाषाण से बनी हुई है, कदाचित इसीलिए इसे 'कालाराम' कहा जाता है।
पूरा मंदिर 74 मीटर लंबा और 32 मीटर चौड़ा है। मंदिर की चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं। इस मंदिर के कलश तक की ऊँचाई 69 फीट है तथा कलश शुद्ध सोने से निर्मित किया हुआ है। पूर्व महाद्वार से प्रवेश करने पर भव्य सभामंडप नजर आता है, जिसकी ऊँचाई 12 फीट होने के साथ यहाँ चालीस स्तम्भ है। गर्भ गृह के सामने श्री हनुमानजी का मंदिर है, हनुमान जी की दृष्टी प्रभु श्रीराम के चरणों की ओर प्रतीत होती हैं।
कहा जाता है कि यह  मंदिर भगवान श्री राम द्वारा निर्मित पर्णकुटी के स्थान पर बनाया गया है, कुछ लोग पर्णकुटी का स्थान समीपस्थ तपोवन में बताते हैं l किम्वदंती है कि साधुओं को अरुणा-वरुणा नदियों पर प्रभु की यह मूर्ति प्राप्त हुई थी और उन्होंने इसे लकड़ी के मंदिर में विराजित किया था। तत्पश्चात 1780 में माधवराव पेशवा की मातोश्री गोपिकाबाई की सूचना पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया। उस काल के दौरान मंदिर निर्माण में 23 लाख का खर्च अनुमानित बताया जाता है।

मंदिर के समीप ही में सीता गुफा एवं पंचवटी स्थित है और दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी नदी भी समीप ही है जहाँ प्रसिद्ध रामकुंड है।

सन्दर्भों के अनुसार ईस्वी सन 1932 में डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर ने इसी कालेराम मंदिर में अस्पृश्यों / दलितों को प्रवेश दिलाने के लिए अस्पृश्यता उन्मूलन आन्दोलन किया था l